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mahabharat 12.21.17: उसका यह लोक और परलोक दोनों ही सफल हैं। मैं मानता हूँ कि संन्यास द्वारा निर्वाण प्राप्त करना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है; क्योंकि उसमें अनेक बाधाएँ हैं॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.21.17 
तस्यायं च परश्चैव लोक: स्यात् सफलोदय:।
निर्वाणं हि सुदुष्प्राप्यं बहुविघ्नं च मे मतम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उसका यह लोक और परलोक दोनों ही सफल हैं। मैं मानता हूँ कि संन्यास द्वारा निर्वाण प्राप्त करना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है; क्योंकि उसमें अनेक बाधाएँ हैं॥17॥
 
His both this world and the next are successful. I believe that it is extremely difficult and rare to attain nirvana through renunciation; because there are many obstacles in it.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)