Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.21.13-16: कुन्तीनन्दन! अतः तुम भी इस धर्म का पालन करने का प्रयत्न करो। जो क्षत्रिय राज्य के सिंहासन पर आसीन है, अपनी समस्त इन्द्रियों को सदैव वश में रखता है, प्रिय-अप्रिय को समान दृष्टि से देखता है, यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाता है, शास्त्रों के सच्चे रहस्यों को जानता है, दुष्टों का दमन करता है और पुण्यात्मा पुरुषों का अनुसरण करता है, समस्त प्रजा को धर्म के मार्ग पर लगाता है और स्वयं भी धर्मानुसार आचरण करता है, वह वृद्धावस्था में राजलक्ष्मी को अपने पुत्र के अधीन करके वन में चला जाता है और जंगली फल-मूल खाकर अपना जीवन व्यतीत करता है। वहीं अपना सारा समय व्यतीत करता है और वहाँ भी आलस्य का त्याग करके शास्त्रविहित रीति से आचरण करता है। ऐसा आचरण करने वाला राजा ही निश्चय ही धर्म को जानता और उसका पालन करता है। | mahabharat अध्याय 12.21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तस्मादेतत् प्रयत्नेन कौन्तेय प्रतिपालय।
यो हि राज्ये स्थित: शश्वद् वशी तुल्यप्रियाप्रिय:॥ १३॥
क्षत्रियो यज्ञशिष्टाशी राजा शास्त्रार्थतत्त्ववित् ।
असाधुनिग्रहरत: साधूनां प्रग्रहे रत:॥ १४॥
धर्मवर्त्मनि संस्थाप्य प्रजा वर्तेत धर्मत:।
पुत्रसंक्रामितश्रीश्च वने वन्येन वर्तयन्॥ १५॥
विधिना श्रावणेनैव कुर्यात् कर्माण्यतन्द्रित:।
य एवं वर्तते राजन् स राजा धर्मनिश्चित:॥ १६॥
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! अतः तुम भी इस धर्म का पालन करने का प्रयत्न करो। जो क्षत्रिय राज्य के सिंहासन पर आसीन है, अपनी समस्त इन्द्रियों को सदैव वश में रखता है, प्रिय-अप्रिय को समान दृष्टि से देखता है, यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाता है, शास्त्रों के सच्चे रहस्यों को जानता है, दुष्टों का दमन करता है और पुण्यात्मा पुरुषों का अनुसरण करता है, समस्त प्रजा को धर्म के मार्ग पर लगाता है और स्वयं भी धर्मानुसार आचरण करता है, वह वृद्धावस्था में राजलक्ष्मी को अपने पुत्र के अधीन करके वन में चला जाता है और जंगली फल-मूल खाकर अपना जीवन व्यतीत करता है। वहीं अपना सारा समय व्यतीत करता है और वहाँ भी आलस्य का त्याग करके शास्त्रविहित रीति से आचरण करता है। ऐसा आचरण करने वाला राजा ही निश्चय ही धर्म को जानता और उसका पालन करता है।
Kuntinandan! Therefore, you also try to follow this religion. The one who is seated on the throne of a Kshatriya kingdom, always keeps all his senses under control, looks at the beloved and the unloved with equal eyes, eats the food left over from the Yagya, knows the true secrets of the scriptures, suppresses the wicked and follows the virtuous men, sets all the subjects on the path of religion and behaves according to religion himself, in his old age, after subordinating Raja Lakshmi to his son, goes to the forest and lives his life eating wild fruits and roots. He spends all his time there and there too he abandons laziness and follows the scriptures prescribed by the scriptures. Only that king, who behaves like this, will surely know and follow the religion.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥