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mahabharat 12.209.d76-d77: देवर्षि! सभी कर्मों और उनके फलों का आदि और अंत होता है; परंतु मेरा भक्त अंतिम (नाशवान) फलों को भोगता नहीं; इसलिए तुम आलस्य छोड़कर सदैव मेरा ध्यान करो। ऐसा करने से तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परम धाम को देखोगे।   |   mahabharat अध्याय 12.209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक d76-d77
 
 
श्लोक  12.209.d76-d77 
कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्भक्तो नान्तमश्नुते॥
मामेव तस्माद् देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रित:।
अवाप्स्यसि तत: सिद्धिं द्रक्ष्यस्येव पदं मम॥
 
 
अनुवाद
देवर्षि! सभी कर्मों और उनके फलों का आदि और अंत होता है; परंतु मेरा भक्त अंतिम (नाशवान) फलों को भोगता नहीं; इसलिए तुम आलस्य छोड़कर सदैव मेरा ध्यान करो। ऐसा करने से तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परम धाम को देखोगे।
 
Devarshi! All the actions and their results have a beginning and an end; but my devotee does not enjoy the final (perishable) results; therefore you should always meditate on me without laziness. By doing this you will attain supreme success and you will see my supreme abode.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)