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mahabharat 12.209.d71: यदि कोई अहंकार का आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तप करता है, तो उसे उन यज्ञों का फल तो मिलता है, परंतु वह उसे जन्म-मरण के चक्र में ले जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक d71
 
 
श्लोक  12.209.d71 
यद्यहङ्कारमाश्रित्य यज्ञदानतप:क्रिया:॥
कुर्वंस्तत्फलमाप्नोति पुनरावर्तनं तु तत्।
 
 
अनुवाद
यदि कोई अहंकार का आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तप करता है, तो उसे उन यज्ञों का फल तो मिलता है, परंतु वह उसे जन्म-मरण के चक्र में ले जाता है।
 
If someone takes shelter of ego and performs sacrifices, charity and penance, then he gets the fruits of those sacrifices. But it leads him into the cycle of birth and death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)