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mahabharat 12.209.d5-d6: नारदजी ने पूछा - प्रभु ! महर्षि कहते हैं, आप अविनाशी (अनन्त), परब्रह्म, निर्गुण, अज्ञान और तमोगुण रूपी अंधकार से परे, ज्ञान के स्वामी, परमधाम ब्रह्म के स्वरूप और उनकी प्रकट भूमि आदिकमाल के उद्गम स्थान हैं। भगवान भूत और भविष्य के स्वामी हैं! भक्त और जितेन्द्रिय भक्त तथा मोक्ष की इच्छा रखने वाले योगीजन आपके स्वरूप का किस प्रकार चिंतन करें?   |   mahabharat अध्याय 12.209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक d5-d6
 
 
श्लोक  12.209.d5-d6 
नारद उवाच
त्वामक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमस: परम्।
आहुर्वेद्यं परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम्॥
भगवन् भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितेन्द्रियै:।
कथं भक्तैर्विचिन्त्योऽसि योगिभिर्मोक्षकांक्षिभि:॥
 
 
अनुवाद
नारदजी ने पूछा - प्रभु ! महर्षि कहते हैं, आप अविनाशी (अनन्त), परब्रह्म, निर्गुण, अज्ञान और तमोगुण रूपी अंधकार से परे, ज्ञान के स्वामी, परमधाम ब्रह्म के स्वरूप और उनकी प्रकट भूमि आदिकमाल के उद्गम स्थान हैं। भगवान भूत और भविष्य के स्वामी हैं! भक्त और जितेन्द्रिय भक्त तथा मोक्ष की इच्छा रखने वाले योगीजन आपके स्वरूप का किस प्रकार चिंतन करें?
 
Naradji asked-Lord! Maharishis say, You are imperishable (eternal), Parabrahma, Nirguna, beyond the darkness of ignorance and Tamoguna, the lord of knowledge, the form of supreme abode, Brahma and the place of origin of his manifest land – Aadikmal. God is the master of past and future! How should devout and Jitendriya devotees and yogis who desire salvation contemplate about your form?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)