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mahabharat 12.209.d48: आप ब्रह्मांड के रचयिता, भोक्ता और शाश्वत सत्ता हैं। यद्यपि आप सार हैं, फिर भी आप उससे सर्वथा भिन्न हैं। आप कर्म के कारण नहीं हैं। आप अपरिवर्तनीय परमात्मा हैं। आप प्रत्येक शरीर में एक पृथक आत्मा के रूप में विद्यमान हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक d48
 
 
श्लोक  12.209.d48 
स्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्यतत्त्वस्तत्त्वसंज्ञित:॥
अकर्महेतुरचल: पृथगात्मन्यवस्थित:।
 
 
अनुवाद
आप ब्रह्मांड के रचयिता, भोक्ता और शाश्वत सत्ता हैं। यद्यपि आप सार हैं, फिर भी आप उससे सर्वथा भिन्न हैं। आप कर्म के कारण नहीं हैं। आप अपरिवर्तनीय परमात्मा हैं। आप प्रत्येक शरीर में एक पृथक आत्मा के रूप में विद्यमान हैं।
 
You are the creator, enjoyer and the eternal being of the universe. Though you are the essence, you are completely different from it. You are not the cause of action. You are the unchangeable Supreme Soul. You are present in each body as a separate soul.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)