Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.209.d38: जो आत्मा रूप में पाँच ज्ञानेन्द्रियों रूपी मुखों के द्वारा शब्द आदि पाँच विषयों का भोग करते हैं तथा स्वयं महान् होते हुए भी गुणों का अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझ पर प्रसन्न हों। | mahabharat अध्याय 12.209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
क्षेत्रज्ञ: पञ्चधा भुङ्क्ते प्रकृतिं पञ्चभिर्मुखै:।
महान् गुणांश्च यो भुङ्क्ते स महात्मा प्रसीदतु॥
अनुवाद
जो आत्मा रूप में पाँच ज्ञानेन्द्रियों रूपी मुखों के द्वारा शब्द आदि पाँच विषयों का भोग करते हैं तथा स्वयं महान् होते हुए भी गुणों का अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझ पर प्रसन्न हों।
May Mahatma Sri Hari be pleased with me, who, in the form of a soul, enjoys the five objects like words, through the mouths in the form of five sense organs, and who experiences the virtues despite being great himself.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥