Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.209.d32: मैं भगवान श्री हरि की शरण लेता हूँ, जो ज्ञान और ध्यान से परिपूर्ण हैं और जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है और जो इस संसार में कभी लौटकर नहीं आते। | mahabharat अध्याय 12.209: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणा:।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गत:॥
अनुवाद
मैं भगवान श्री हरि की शरण लेता हूँ, जो ज्ञान और ध्यान से परिपूर्ण हैं और जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है और जो इस संसार में कभी लौटकर नहीं आते।
I take refuge in Lord Shri Hari, who is full of wisdom and meditation and who has controlled his senses and who never returns to this world.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥