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mahabharat 12.207.d8-d12: नारदजी ने देखा कि समस्त कारणों के पीछे कारण भगवान जगन्नाथ हैं। उनके चरण समस्त देवताओं के स्वर्ण मुकुटों के कुमकुम से लाल हैं। गरुड़जी पर सवार होने के कारण उनके दोनों घुटनों पर रगड़ के कारण चिह्न बन गए हैं; जो उन घुटनों की शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके श्याम और सुंदर शरीर पर पीला वस्त्र शोभा दे रहा है और कमर में किंकिणी के फीते बंधे हुए हैं। वक्षस्थल पर श्रीवत्स की स्वर्णिम रेखा शोभा दे रही है। उनके गले में सुंदर कौस्तुभमणि अपनी ज्योति बिखेर रही है। उनके मुख पर मनोहर मुस्कान फैल रही है। बड़ी-बड़ी आँखें चंचल गति से इधर-उधर देख रही हैं। दो धनुषों के समान मुड़ी हुई भौहें उनके मुख की शोभा बढ़ा रही हैं। नाना प्रकार के रत्नों, बहुमूल्य रत्नों और हीरों से जड़ित मकर के आकार के कुण्डल चमक रहे हैं। उनके शरीर की कांति नीलम के समान श्याम है। उनकी भुजाओं में बाजूबंद और सिर पर मुकुट से तेज चमक रही है और इंद्र आदि देवता तथा महर्षियों का समूह उनकी स्तुति कर रहा है। प्रभु का यह दृश्य देखकर नारद जी ने सिर झुकाकर जय-जयकार करते हुए उन्हें प्रणाम किया।   |   mahabharat अध्याय 12.207: श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 207: श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन  »  श्लोक d8-d12
 
 
श्लोक  12.207.d8-d12 
तमागतं जगन्नाथं सर्वकारणकारणम्।
अखिलामरमौल्यङ्गरुक्मारुणपदद्वयम्॥
वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम्।
पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम्॥
श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तुभकन्धरम्।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम्॥
नम्रचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम्।
नानारत्नमणिवज्रस्फुरन्मकरकुण्डलम्॥
इन्द्रनीलनिभाभं तं केयूरमुकुटोज्ज्वलम्।
देवैरिन्द्रपुरोगैश्च ऋषिसङ्घैरभिष्टुतम्॥
नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम्।
 
 
अनुवाद
नारदजी ने देखा कि समस्त कारणों के पीछे कारण भगवान जगन्नाथ हैं। उनके चरण समस्त देवताओं के स्वर्ण मुकुटों के कुमकुम से लाल हैं। गरुड़जी पर सवार होने के कारण उनके दोनों घुटनों पर रगड़ के कारण चिह्न बन गए हैं; जो उन घुटनों की शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके श्याम और सुंदर शरीर पर पीला वस्त्र शोभा दे रहा है और कमर में किंकिणी के फीते बंधे हुए हैं। वक्षस्थल पर श्रीवत्स की स्वर्णिम रेखा शोभा दे रही है। उनके गले में सुंदर कौस्तुभमणि अपनी ज्योति बिखेर रही है। उनके मुख पर मनोहर मुस्कान फैल रही है। बड़ी-बड़ी आँखें चंचल गति से इधर-उधर देख रही हैं। दो धनुषों के समान मुड़ी हुई भौहें उनके मुख की शोभा बढ़ा रही हैं। नाना प्रकार के रत्नों, बहुमूल्य रत्नों और हीरों से जड़ित मकर के आकार के कुण्डल चमक रहे हैं। उनके शरीर की कांति नीलम के समान श्याम है। उनकी भुजाओं में बाजूबंद और सिर पर मुकुट से तेज चमक रही है और इंद्र आदि देवता तथा महर्षियों का समूह उनकी स्तुति कर रहा है। प्रभु का यह दृश्य देखकर नारद जी ने सिर झुकाकर जय-जयकार करते हुए उन्हें प्रणाम किया।
 
Naradji saw that the reason behind all the reasons is Lord Jagannath. His feet are red with the kumkum of the golden crowns of all the gods. Due to riding on Garudaji, marks have formed on both his knees due to rubbing; which are enhancing the beauty of those knees. Yellow cloth is looking good on his dark and beautiful body and strings of kinkini are tied around his waist. Golden line of Shrivatsa is looking good on his chest. The beautiful Kaustubhamani is spreading its light around his neck. A beautiful smile is spreading on his face. Big eyes are looking here and there with a playful movement. Eyebrows bent like two bows are enhancing the beauty of his face. Makara-shaped earrings studded with various types of gems, precious stones and diamonds are shining. The glow of his body is dark like sapphire. The armlets on his arms and the crown on his head are radiating a bright glow and the gods like Indra and the group of great sages are praising him. Seeing this sight of the Lord, Narada ji bowed his head and saluted him while chanting Jai-Jai.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)