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mahabharat 12.207.48: महाबाहु भरत, श्रेष्ठ नरेश्वर! नारदजी ने श्रीकृष्ण की परम सनातन दिव्य भावना को उसके वास्तविक स्वरूप में जान लिया है और स्वीकार कर लिया है।   |   mahabharat अध्याय 12.207: श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 207: श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.207.48 
नारदोऽप्यथ कृष्णस्य परं मेने नराधिप।
शाश्वतत्वं महाबाहो यथावद् भरतर्षभ॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
महाबाहु भरत, श्रेष्ठ नरेश्वर! नारदजी ने श्रीकृष्ण की परम सनातन दिव्य भावना को उसके वास्तविक स्वरूप में जान लिया है और स्वीकार कर लिया है।
 
Great-armed Bharata, the best Nareshwar! Naradji has known and accepted the supreme eternal divine feeling of Shri Krishna in its true form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)