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mahabharat 12.206.5: जैसे भूमि का सार एक ही है, फिर भी वह उसमें बोए गए बीज के अनुसार ही सार उत्पन्न करती है। उसी प्रकार अंतरात्मा द्वारा प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है। ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.206.5 
यथा ह्येकरसा भूमिरोषध्यर्थानुसारिणी।
तथा कर्मानुगा बुद्धिरन्तरात्मानुदर्शिनी॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जैसे भूमि का सार एक ही है, फिर भी वह उसमें बोए गए बीज के अनुसार ही सार उत्पन्न करती है। उसी प्रकार अंतरात्मा द्वारा प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है। ॥5॥
 
Just as the land has only one essence, yet it produces the essence according to the type of seed sown in it. Similarly, the intellect enlightened by the inner soul passes from one body to another according to the deeds of the previous birth. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)