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mahabharat 12.206.30: यद्यपि इस पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य इस पृथ्वी का अंत नहीं देख सकता, फिर भी कहीं न कहीं इसका अंत अवश्य है। जिस प्रकार समुद्र में ऊपर-नीचे जाता हुआ जहाज़ अनुकूल दिशा में बहती हवा के द्वारा किनारे पर आ जाता है, उसी प्रकार संसार सागर में गोता लगाने वाले मनुष्य को संसार सागर पार करने में अनुकूल वातावरण सहायता करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.206.30 
पृथ्व्यां नर: पश्यति नान्तमस्या
ह्यन्तश्चास्या भविता चेति विद्धि।
परं नयन्तीह विलोडॺमानं
यथा प्लवं वायुरिवार्णवस्थम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि इस पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य इस पृथ्वी का अंत नहीं देख सकता, फिर भी कहीं न कहीं इसका अंत अवश्य है। जिस प्रकार समुद्र में ऊपर-नीचे जाता हुआ जहाज़ अनुकूल दिशा में बहती हवा के द्वारा किनारे पर आ जाता है, उसी प्रकार संसार सागर में गोता लगाने वाले मनुष्य को संसार सागर पार करने में अनुकूल वातावरण सहायता करता है।
 
Though a man living on this earth cannot see the end of this earth, yet it must have an end somewhere. Just as a ship going up and down in the sea is brought to the shore by a wind blowing in the favourable direction of the current, similarly a man diving into the ocean of the world is helped by a favourable environment to cross the ocean of the world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)