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mahabharat 12.206.2-3: जिस प्रकार एक ही धागा सोने की जंजीरों, मोतियों, मूंगों और मिट्टी के मनकों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी, हिरण और कीड़े-मकोड़ों आदि सभी के शरीरों में एक ही ईश्वर विद्यमान है! सांसारिक सुखों में आसक्त आत्मा अपने-अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती है।   |   mahabharat अध्याय 12.206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.206.2-3 
तदेव च यथा सूत्रं सुवर्णे वर्तते पुन:।
मुक्तास्वथ प्रवालेषु मृन्मये राजते तथा॥ २॥
तद्वद् गोऽश्वमनुष्येषु तद्वद्धस्तिमृगादिषु।
तद्वत् कीटपतङ्गेषु प्रसक्तात्मा स्वकर्मभि:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार एक ही धागा सोने की जंजीरों, मोतियों, मूंगों और मिट्टी के मनकों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी, हिरण और कीड़े-मकोड़ों आदि सभी के शरीरों में एक ही ईश्वर विद्यमान है! सांसारिक सुखों में आसक्त आत्मा अपने-अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती है।
 
Just as the same thread is adorned with gold chains, pearls, corals and beads of clay beads, similarly the same God is present in all the bodies of cow, horse, human, elephant, deer and insects etc.! The soul attached to worldly pleasures takes different bodies according to its respective deeds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)