श्लोक 1: मनु कहते हैं - बृहस्पति! जब मनुष्य अपनी पाँचों इन्द्रियों और मन को, तथा शब्द आदि पाँचों इन्द्रिय-विषयों को वश में कर लेता है, तब वह उस परम ब्रह्म को जान लेता है जो रत्नों से आवृत सूत के समान सर्वव्यापी है।॥1॥
श्लोक 2-3: जिस प्रकार एक ही धागा सोने की जंजीरों, मोतियों, मूंगों और मिट्टी के मनकों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी, हिरण और कीड़े-मकोड़ों आदि सभी के शरीरों में एक ही ईश्वर विद्यमान है! सांसारिक सुखों में आसक्त आत्मा अपने-अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती है।
श्लोक 4: मनुष्य जिस भी शरीर से जो भी कर्म करता है, वह उसी शरीर से उन कर्मों का फल भोगता है ॥4॥
श्लोक 5: जैसे भूमि का सार एक ही है, फिर भी वह उसमें बोए गए बीज के अनुसार ही सार उत्पन्न करती है। उसी प्रकार अंतरात्मा द्वारा प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है। ॥5॥
श्लोक 6: पहले मनुष्य को वस्तु का ज्ञान होता है; फिर उसके मन में उसे प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है। तत्पश्चात् वह उस कार्य को करने का संकल्प करता है और प्रयत्न करने लगता है। तब कार्य पूर्ण होता है और उसका फल प्राप्त होता है।॥6॥
श्लोक 7: इस प्रकार कर्म के परिणाम को ही समझो। कर्म को जानने में जो विषय आते हैं, उनके स्वरूप को समझो और ज्ञान के विषय को ही ज्ञान का स्वरूप समझो तथा ज्ञान के स्वरूप, प्रभाव और कारण को जानो। ॥7॥
श्लोक 8: समस्त ज्ञान, परिणाम, ज्ञेय और कर्म के समाप्त हो जाने पर जो कुछ भी प्राप्ति के फलस्वरूप शेष रह जाए, उसे तू समस्त ज्ञेय में व्याप्त ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही समझ ॥8॥
श्लोक 9: केवल योगीजन ही उस परम महान् तत्त्व को देख पाते हैं। विषयों में आसक्त अज्ञानी मनुष्य अपने भीतर स्थित परमेश्वर को नहीं देख पाते ॥9॥
श्लोक 10-12: इस संसार में पृथ्वी के स्वरूप से जल का स्वरूप महान है। जल से भी तेज महान है, तेज से भी वायु महान है, वायु से भी आकाश महान है, आकाश से भी मन महान है अर्थात् सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान है। मन से भी बुद्धि महान है, बुद्धि से भी काल महान है और भगवान विष्णु अनंत, सूक्ष्म, श्रेष्ठ और काल से भी महान हैं। यह सारा जगत उन्हीं की रचना है। उन भगवान विष्णु का न आदि है, न मध्य और न अंत।
श्लोक 13: क्योंकि वह आदि, मध्य और अन्त से रहित है, अविनाशी है; इसलिए वह समस्त दुःखों से परे है, क्योंकि नाशवान वस्तु स्वयं दुःखरूप हो जाती है ॥13॥
श्लोक 14: अविनाशी विष्णु को ही परम ब्रह्म कहा गया है। वे ही परम धाम और परम पद हैं। उन्हें प्राप्त करके जीव काल के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।
श्लोक 15: ये मारण जीव के गुणों में अर्थात् गुणों के कार्यरूप, शरीर आदि के सम्बन्ध में व्यक्त हो रहे हैं; परन्तु ईश्वर निर्गुण होने के कारण इनसे परे है। जो धर्म निवृत्ति (निष्काम कर्म) रूप है, वही शाश्वत पद (मोक्ष) को प्राप्त कराने में समर्थ है। 15॥
श्लोक 16: ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद - ये अध्ययनकाल में शरीर के अधीन रहते हैं और जिह्वा के अग्रभाग पर प्रकट होते हैं; अतः इनका अध्ययन कठिन और नाशवान है, अर्थात् इनका लुप्त होना स्वाभाविक है॥16॥
श्लोक 17: किन्तु यदि परब्रह्म इस प्रकार शरीर का आश्रय लेकर प्रकट भी हो जाय, तो भी उसका अध्ययन वेदों के अध्ययन के समान सरलता से संभव नहीं है, क्योंकि उसका न आदि है, न मध्य, न अन्त।
श्लोक 18: इसे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का आरंभ कहा गया है। जिन चीज़ों का आरंभ होता है, उनका अंत भी होता देखा गया है। ब्रह्म का कोई आरंभ नहीं है।
श्लोक 19: वे अनादि और अनंत होने से नित्य और अविनाशी हैं। नित्य होने से वे दुःखों से रहित हैं। उनमें सुख-दुःख का कोई द्वन्द्व नहीं है; अतः वे सबसे परे हैं॥19॥
श्लोक 20: परंतु दुर्भाग्य, साधनहीनता और कर्मफल की आसक्ति के कारण मनुष्य उस मार्ग को नहीं देख पाते जो भगवान् की प्राप्ति का मार्ग है । 20॥
श्लोक 21: मनुष्य को भौतिक वस्तुओं में आसक्ति होती है, क्योंकि इन्द्रिय सुख नित्य हैं; यह उनकी भावना है और वे अपने मन में सांसारिक वस्तुओं को पाने की इच्छा रखते हैं; इसीलिए वे परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाते।
श्लोक 22: संसारी मनुष्य इस संसार में जो भी वस्तुएँ देखते हैं, उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं। परब्रह्म ही परम पुरुष हैं, उन्हें प्राप्त करने की उनकी कोई इच्छा नहीं होती, क्योंकि वे गुणार्थी हैं और परब्रह्म निर्गुण हैं।॥ 22॥
श्लोक 23: भला, जो इन तुच्छ बातों में उलझा हुआ है, वह परम दैवी गुणों को कैसे जान सकता है? जैसे धुएँ से अग्नि का अनुमान किया जाता है, वैसे ही नित्यता आदि दैवी गुणों से परमेश्वर के स्वरूप का संकेत किया जा सकता है॥23॥
श्लोक 24: ध्यान द्वारा शुद्ध और परिष्कृत किए हुए मन से हम भगवान के स्वरूप का अनुभव तो कर सकते हैं, परंतु शब्दों से उसका वर्णन नहीं कर सकते, क्योंकि मन के द्वारा ही मानसिक विषयों को ग्रहण किया जा सकता है और ज्ञान के द्वारा ही ज्ञेय को जाना जा सकता है॥ 24॥
श्लोक 25: अतः ज्ञान द्वारा बुद्धि को, बुद्धि द्वारा मन को तथा मन द्वारा इन्द्रियों को शुद्ध एवं पवित्र करके अविनाशी परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।
श्लोक 26: जो व्यक्ति बुद्धि में निपुण है, अर्थात् जो शुद्ध और सूक्ष्म बुद्धि से युक्त है और मानसिक बल से युक्त है, वह समस्त कामनाओं से परे निर्गुण ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार वायु लकड़ी में अदृश्य अग्नि को जलाए बिना ही छोड़ देती है, उसी प्रकार कामनाओं से व्याकुल मनुष्य भी अपने शरीर में स्थित ईश्वर को त्याग देते हैं, अर्थात् उसे जानने और प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते।
श्लोक 27: जब साधक साधनों के गुणों को अपनाकर उन सांसारिक वस्तुओं से मन को हटा लेता है, तब उसका मन बुद्धि द्वारा उत्पन्न शुभ-अशुभ विचारों से रहित होकर सर्वदा शुद्ध रहता है। जब साधन में लगा हुआ साधक गुणों से परे चला जाता है, तब उसे ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है॥27॥
श्लोक 28: मनुष्य का आत्मा (वास्तविक स्वरूप) अव्यक्त है और उसके कर्म शरीर रूप में व्यक्त होते हैं। अतः अन्त में वह अव्यक्त भाव को प्राप्त होता है। किन्तु वह आत्मा, जो कामनाओं के अधीन हो गई है, उन बढ़ी हुई इन्द्रियों से युक्त होकर पुनः संसार में आती है, अर्थात् पुनः शरीर धारण करती है। 28॥
श्लोक 29: समस्त इन्द्रियों से युक्त होकर यह देहधारी जीवात्मा पंचभूत रूपी शरीर के अधीन हो जाता है। ज्ञान और उपासना आदि की शक्ति के बिना वह केवल कर्मों द्वारा ईश्वर को नहीं पा सकता। इसलिए वह उस अविनाशी ईश्वर से वंचित रह जाता है। 29॥
श्लोक 30: यद्यपि इस पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य इस पृथ्वी का अंत नहीं देख सकता, फिर भी कहीं न कहीं इसका अंत अवश्य है। जिस प्रकार समुद्र में ऊपर-नीचे जाता हुआ जहाज़ अनुकूल दिशा में बहती हवा के द्वारा किनारे पर आ जाता है, उसी प्रकार संसार सागर में गोता लगाने वाले मनुष्य को संसार सागर पार करने में अनुकूल वातावरण सहायता करता है।
श्लोक 31: जैसे सम्पूर्ण जगत् का प्रकाशक सूर्य प्रकाश गुण प्राप्त करके अपनी किरणों को समेटकर सूर्यास्त के समय निर्गुण हो जाता है, वैसे ही विवेकरहित मुनि यहाँ अविनाशी निर्गुण ब्रह्म में प्रवेश करता है ॥31॥
श्लोक 32: जो कहीं से नहीं आया है, जो नित्य है, जो पुण्यात्माओं का परम गन्तव्य है, जो स्वयंभू (अजन्मा) है, जो सबका उत्पत्ति और विनाश का स्थान है, जो अविनाशी और नित्य है, अमर है, अपरिवर्तनीय है और अचल है, उस परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परम मोक्ष को प्राप्त होता है॥ 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥