अज्ञानतृप्तो विषयेष्ववगाढो न तृप्यते।
अदृष्टवच्च भूतात्मा विषयेभ्यो निवर्तते॥ ५॥
अनुवाद
जो मनुष्य केवल अज्ञान से ही संतोष प्राप्त करता है, वह सांसारिक सुखों के गहरे जल में डूबा रहने पर भी कभी संतुष्ट नहीं होता। वह जीवात्मा प्रारब्ध से बंधा हुआ, सांसारिक सुखों की इच्छा से ही बार-बार इस संसार में आता है और जन्म लेता है। ॥5॥
The person who gets satisfaction only through ignorance, is never satisfied even though he is always immersed in the deep waters of worldly pleasures. That soul, bound by destiny, comes to this world again and again and takes birth due to the desire for worldly pleasures. ॥ 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥