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mahabharat 12.204.2: जैसे मनुष्य स्वच्छ और शान्त जल में अपना प्रतिबिम्ब देखता है, वैसे ही जब मन सहित उसकी इन्द्रियाँ शुद्ध और शान्त हो जाती हैं, तब वह ज्ञानचक्षु से ज्ञेय आत्मा को देख सकता है ॥2॥   |   mahabharat अध्याय 12.204: आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 204: आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.204.2 
यथाम्भसि प्रसन्ने तु रूपं पश्यति चक्षुषा।
तद्वत्प्रसन्नेन्द्रियत्वाज्ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति॥ २॥
 
 
अनुवाद
जैसे मनुष्य स्वच्छ और शान्त जल में अपना प्रतिबिम्ब देखता है, वैसे ही जब मन सहित उसकी इन्द्रियाँ शुद्ध और शान्त हो जाती हैं, तब वह ज्ञानचक्षु से ज्ञेय आत्मा को देख सकता है ॥2॥
 
Just as a man sees his own reflection in clean and still water, so when his senses, including the mind, become pure and still, he can see the knowable Self with the eye of knowledge. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)