श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 204: आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  12.204.13-14 
उद्यन् हि सविता यद्वत्सृजते रश्मिमण्डलम्।
स एवास्तमपागच्छंस्तदेवात्मनि यच्छति॥ १३॥
अन्तरात्मा तथा देहमाविश्येन्द्रियरश्मिभि:।
प्राप्येन्द्रियगुणान् पञ्च सोऽस्तमावृत्य गच्छति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जैसे सूर्य उदय होकर अपनी किरणों को सब दिशाओं में फैलाता है और अस्त होते समय उन सबको अपने भीतर समेट लेता है, वैसे ही आत्मा भी शरीर में प्रवेश करके इन्द्रियों की किरणों के द्वारा पाँचों इन्द्रियों को पकड़ लेता है और शरीर छोड़ते समय उन सबको समेटकर अपने साथ ले जाता है।॥13-14॥
 
Just as the sun rises and spreads its rays in all directions and at the time of setting gathers them all within itself, similarly, the soul, after entering the body, grasps the five senses through the rays of the senses and at the time of leaving the body gathers them all and takes them with itself.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)