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mahabharat 12.203.5: श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ आपको स्वयं नहीं जान सकतीं। आत्मा सर्वज्ञ है और सबका साक्षी है। सर्वज्ञ होने के कारण वह सबको जानता है॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.203.5 
श्रोत्रादीनि न पश्यन्ति स्वं स्वमात्मानमात्मना।
सर्वज्ञ: सर्वदर्शी च सर्वज्ञस्तानि पश्यति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ आपको स्वयं नहीं जान सकतीं। आत्मा सर्वज्ञ है और सबका साक्षी है। सर्वज्ञ होने के कारण वह सबको जानता है॥5॥
 
The senses like hearing etc. cannot know you on their own. The soul is omniscient and the witness of everything. Being omniscient, it knows them all.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)