श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.203.4 
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो
न पश्यति स्पर्शनमिन्द्रियेन्द्रियम्।
न श्रोत्रलिङ्गं श्रवणेन दर्शनं
तथा कृतं पश्यति तद् विनश्यति॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपनी आँखों से आत्मा के स्वरूप को नहीं देख सकता। त्वचा नामक इन्द्रिय उसे स्पर्श नहीं कर सकती, क्योंकि वह इन्द्रियों की इन्द्रिय है, अर्थात् उनका प्रकाशक है। उस आत्मा के स्वरूप को श्रोत्रेन्द्रिय से सुना नहीं जा सकता, क्योंकि वह शब्दहीन है। जब ज्ञानरूपी विचारों द्वारा आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब उसके साधन अवरुद्ध हो जाते हैं ॥4॥
 
A man cannot see the form of the soul through his eyes. The sense organ called skin cannot touch it because it is the sense of the senses, i.e. it is their illuminator. The form of that soul cannot be heard through the sense of hearing because it is wordless. When the soul is realized through the thoughts of knowledge, then its means get obstructed. ॥4॥
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