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mahabharat 12.203.14: जैसे इन्द्रियाँ भी इन्द्रियों के द्वारा जानी जाने वाली किसी वस्तु को नहीं जान सकतीं, वैसे ही परम बुद्धि भी उस परम इन्द्रियग्राही तत्त्व को स्वयं नहीं देख सकती; परन्तु ज्ञानी पुरुष ही अपनी बुद्धि के द्वारा उसे अनुभव करता है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.203.14 
नोत्सहन्ते यथा वेत्तुमिन्द्रियैरिन्द्रियाण्यपि।
तथैवेह परा बुद्धि: परं बोध्यं न पश्यति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जैसे इन्द्रियाँ भी इन्द्रियों के द्वारा जानी जाने वाली किसी वस्तु को नहीं जान सकतीं, वैसे ही परम बुद्धि भी उस परम इन्द्रियग्राही तत्त्व को स्वयं नहीं देख सकती; परन्तु ज्ञानी पुरुष ही अपनी बुद्धि के द्वारा उसे अनुभव करता है ॥14॥
 
Just as the senses also cannot know anything that can be known through the senses, in the same way the supreme intellect also cannot see that ultimate sensible element itself; But only the knowledgeable person realizes it through his intellect. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)