श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.203.13 
अहिरेव ह्यहे: पादान् पश्यतीति हि न: श्रुतम्।
तद्वन्मूर्तिषु मूर्तिस्थं ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हमने सुना है कि सर्प ही सर्प के पैरों को पहचान सकता है, उसी प्रकार मनुष्य भी ज्ञान के द्वारा ही समस्त शरीरों में स्थित जानने योग्य आत्मा को जान सकता है ॥13॥
 
We have heard that only the snake can recognize the snake's legs, similarly man can know the knowable soul present in all the bodies only through knowledge. 13॥
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