श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 203: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  12.203.11-12 
न हि खल्वनुपायेन कश्चिदर्थोऽभिसिद्धॺति।
सूत्रजालैर्यथा मत्स्यान् बध्नन्ति जलजीविन:॥ ११॥
मृगैर्मृगाणां ग्रहणं पक्षिणां पक्षिभिर्यथा।
गजानां च गजैरेव ज्ञेयं ज्ञानेन गृह्यते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उचित उपाय किए बिना किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसे जलचर जीवों से जीविका चलाने वाले लोग धागे का जाल बनाकर उससे मछलियाँ पकड़ते हैं। जैसे मृग मृग को, पक्षियों को पक्षियों को और हाथियों को हाथियों को पकड़ते हैं, वैसे ही ज्ञान से ज्ञेय वस्तु की प्राप्ति होती है। ॥11-12॥
 
No purpose can be achieved without taking appropriate measures. Just as those who make their living from aquatic creatures make nets of thread and catch fish with them. Just as deer are caught by deer, birds by birds and elephants by elephants, in the same way the knowable object is acquired through knowledge. ॥ 11-12॥
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