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mahabharat 12.202.9: जैसे अग्नि से प्रज्वलित दीपक अपने को तथा समीपवर्ती अन्य वस्तुओं को प्रकाशित करता है, वैसे ही इस शरीररूपी वृक्ष में स्थित पाँचों इन्द्रियाँ चेतनारूपी ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित होकर वस्तुओं को प्रकाशित करती हैं (चूँकि उनका प्रकाश चेतनारूपी प्रकाश पर आश्रित है, अतः वे पराधीन हैं; वे स्वयं को प्रकाशित करने में समर्थ नहीं हैं)।॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.202.9 
यथा प्रदीप्त: पुरत: प्रदीप:
प्रकाशमन्यस्य करोति दीप्यन्।
तथेह पञ्चेन्द्रियदीपवृक्षा
ज्ञानप्रदीप्ता: परवन्त एव॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जैसे अग्नि से प्रज्वलित दीपक अपने को तथा समीपवर्ती अन्य वस्तुओं को प्रकाशित करता है, वैसे ही इस शरीररूपी वृक्ष में स्थित पाँचों इन्द्रियाँ चेतनारूपी ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित होकर वस्तुओं को प्रकाशित करती हैं (चूँकि उनका प्रकाश चेतनारूपी प्रकाश पर आश्रित है, अतः वे पराधीन हैं; वे स्वयं को प्रकाशित करने में समर्थ नहीं हैं)।॥9॥
 
Just as a lamp lit by fire illuminates itself as well as other nearby objects, similarly the five senses situated in this tree of the body, illuminated by the light of knowledge in the form of consciousness, illuminate the objects (since their light is dependent on the light of consciousness, they are dependent; they are not capable of illuminating themselves).॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)