श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.202.8 
यथा हि कश्चित् सुकृतैर्मनुष्य:
शुभाशुभं प्राप्नुतेऽथाविरोधात्।
एवं शरीरेषु शुभाशुभेषु
स्वकर्मजैर्ज्ञानमिदं निबद्धम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जैसे मनुष्य अपने शुभ कर्मों का अच्छा-बुरा फल भिन्न-भिन्न स्थानों और कालों में बिना किसी प्रतिफल के प्राप्त करता है, वैसे ही यह आध्यात्मिक ज्ञान भी कर्मानुसार प्राप्त अच्छे-बुरे शरीरों में बिना किसी प्रतिरोध के स्थित रहता है ॥8॥
 
Just as a person receives the good and bad results of his well-performed deeds in different places and times without any retribution, similarly this spiritual knowledge remains in the good and bad bodies obtained according to one's deeds without any resistance. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)