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mahabharat 12.202.5: अतः जो अपनी जीभ को रस्सी से, नासिका को गंध से, कानों को शब्दों से, त्वचा को स्पर्श से और आँखों को रूप से हटाकर अपनी जीभ को अन्दर की ओर मोड़ लेता है, वही भगवान को उनके मूल स्वरूप में अनुभव कर सकता है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.202.5 
निवर्तयित्वा रसनां रसेभ्यो
घ्राणं च गन्धाच्छ्रवणौ च शब्दात् ।
स्पर्शात् त्वचं रूपगुणात् तु चक्षु-
स्तत: परं पश्यति स्वं स्वभावम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अतः जो अपनी जीभ को रस्सी से, नासिका को गंध से, कानों को शब्दों से, त्वचा को स्पर्श से और आँखों को रूप से हटाकर अपनी जीभ को अन्दर की ओर मोड़ लेता है, वही भगवान को उनके मूल स्वरूप में अनुभव कर सकता है ॥5॥
 
Therefore, only the one who turns his tongue inward by removing his tongue from rope, nostrils from smell, ears from words, skin from touch and eyes from form, can realize God in his original form. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)