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mahabharat 12.202.18: इसी प्रकार जब मनुष्य अपने दृश्य शरीर को त्यागकर दूसरे अदृश्य शरीर में प्रवेश करता है, तब वह पहले वाले भौतिक शरीर को छोड़कर पंचभूतों में लीन हो जाता है और दूसरे शरीर का आश्रय लेकर उसे अपना स्वरूप मान लेता है ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.202.18 
तथा मनुष्य: परिमुच्य काय-
मदृश्यमन्यद् विशते शरीरम्।
विसृज्य भूतेषु महत्सु देहं
तदाश्रयं चैव बिभर्ति रूपम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार जब मनुष्य अपने दृश्य शरीर को त्यागकर दूसरे अदृश्य शरीर में प्रवेश करता है, तब वह पहले वाले भौतिक शरीर को छोड़कर पंचभूतों में लीन हो जाता है और दूसरे शरीर का आश्रय लेकर उसे अपना स्वरूप मान लेता है ॥18॥
 
In the same way, when a man abandons his visible body and enters another invisible body, he leaves the previous physical body to merge with the five elements and takes shelter of the second body and adopts it as his own form. ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)