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mahabharat 12.202.13: परंतु जैसे एक ही लकड़ियों को बुद्धिपूर्वक मथने से अग्नि और धुआँ दोनों देखे जा सकते हैं, वैसे ही जो बुद्धिमान् ज्ञानी पुरुष योग के द्वारा बुद्धि सहित मन और इन्द्रियों को एकीभूत कर लेता है, वह उस ज्ञान और आत्मा को, जो इन सबमें श्रेष्ठ है, अनुभव कर लेता है॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.202.13 
तान्येव काष्ठानि यथा विमथ्य
धूमं च पश्येज्ज्वलनं च योगात्।
तद्वत् सबुद्धि: सममिन्द्रियात्मा
बुध: परं पश्यति तं स्वभावम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
परंतु जैसे एक ही लकड़ियों को बुद्धिपूर्वक मथने से अग्नि और धुआँ दोनों देखे जा सकते हैं, वैसे ही जो बुद्धिमान् ज्ञानी पुरुष योग के द्वारा बुद्धि सहित मन और इन्द्रियों को एकीभूत कर लेता है, वह उस ज्ञान और आत्मा को, जो इन सबमें श्रेष्ठ है, अनुभव कर लेता है॥13॥
 
But just as both fire and smoke can be seen by churning the same sticks judiciously, in the same way an intelligent knowledgeable person who integrates the mind and senses along with the intellect through Yoga, realizes that knowledge and the soul which is the most superior of all these. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)