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श्लोक 12.201.9-10h  |
स मे भवान् शंसतु सर्वमेतत्
सामान्यशब्दैश्च विशेषणैश्च।
स मे भवान् शंसतु तावदेत-
ज्ज्ञाने फलं कर्मणि वा यदस्ति॥ ९॥
यथा च देहाच्च्यवते शरीरी
पुन: शरीरं च यथाभ्युपैति। |
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| अनुवाद |
| अतः कृपा करके इस सम्पूर्ण विषय को सामान्य और विशिष्ट शब्दों में मुझसे कहिए। तत्त्वज्ञान से क्या फल प्राप्त होता है? कर्म करने से क्या फल प्राप्त होता है? शरीर के प्रति सचेतन आत्मा किस प्रकार शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है? - ये सब बातें भी कृपा करके मुझे बताइए॥9 1/2॥ |
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| Therefore, please describe this entire subject to me in general and specific terms. What fruit is obtained by having the knowledge of truth? What fruit is obtained by performing actions? How does a soul conscious about the body leave the body and then enter another body? - please tell me all these things also.॥9 1/2॥ |
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