श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.201.8 
ऋक्सामसंघांश्च यजूंषि चापि
च्छन्दांसि नक्षत्रगतिं निरुक्तम्।
अधीत्य च व्याकरणं सकल्पं
शिक्षां च भूतप्रकृतिं न वेद्मि॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मैंने ऋक्, साम, यजुर्वेद और छन्दक अर्थात् अथर्ववेद का अध्ययन किया है तथा नक्षत्रों की गति, निरुक्त, व्याकरण, कल्प और शिक्षा का भी अध्ययन किया है, फिर भी मैं आकाश आदि पंचमहाभूतों के उपादान कारण को नहीं जान सका॥8॥
 
I have studied Rik, Sama and Yajurveda and Chhandaka i.e. Atharvaveda and also the movement of stars, Nirukta, grammar, Kalpa and Shiksha, yet I could not know the material cause of the five great entities like sky etc. 8॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas