श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.201.7 
ज्ञानं यत: प्रार्थयते नरो वै
ततस्तदर्था भवति प्रवृत्ति:।
न चाप्यहं वेद परं पुराणं
मिथ्याप्रवृत्तिं च कथं नु कुर्याम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जिस वस्तु का ज्ञान रखता है, उसे पाने की इच्छा रखता है और जब उसे पाने की इच्छा होती है, तब वह उसके लिए प्रयत्न करने लगता है; परंतु मैं उस प्राचीन परम वस्तु के विषय में कुछ भी नहीं जानता; फिर मैं उसे पाने के लिए मिथ्या प्रयत्न कैसे कर सकता हूँ?॥7॥
 
A man desires to obtain that which he has knowledge of and when he has a desire to obtain it, he begins to make efforts for it; but I do not know anything about that ancient, supreme object; then how can I make false efforts to obtain it?॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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