न स्त्री पुमान् नापि नपुंसकं च
न सन्न चासत् सदसच्च तन्न।
पश्यन्ति यद् ब्रह्मविदो मनुष्या-
स्तदक्षरं न क्षरतीति विद्धि॥ २७॥
अनुवाद
वह न तो स्त्री है, न पुरुष है, न नपुंसक है। वह न तो सत् है, न मिथ्या है और न ही सत् और असत् का संयोग है। केवल ज्ञानी पुरुष ही उसे देख सकते हैं। उसका कभी क्षय नहीं होता, इसलिए उसे सनातन परब्रह्म परमात्मा कहते हैं। इस बात को अच्छी तरह समझ लो ॥27॥
He is neither a woman nor a man nor a eunuch. He is neither real nor unreal and neither is he a combination of good and bad. Only the enlightened ones can see him. He never decays; therefore, he is called the eternal Supreme Brahma, the Supreme Soul. Understand this thing very well. ॥27॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)