श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.201.25 
यतो जगत‍् सर्वमिदं प्रसूतं
ज्ञात्वाऽऽत्मवन्तो व्यतियान्ति यत् तत्।
यन्मन्त्रशब्दैरकृतप्रकाशं
तदुच्यमानं शृणु मे परं यत्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मैं उस परम तत्व का वर्णन कर रहा हूँ जिससे यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है और जिसे जानकर मन को वश में करने वाले बुद्धिमान पुरुष इस संसार से पार होकर परमपद को प्राप्त होते हैं। जिसका सार स्वरूप वेद के मन्त्रों से पूर्णतः प्रकट नहीं हो सकता। सुनो, मैं उस परम तत्व का वर्णन कर रहा हूँ।
 
I am describing that supreme thing from which this entire universe has originated and by knowing that, the wise men who control their minds transcend this world and attain the supreme state. The essential nature of which cannot be fully revealed through the mantras of the Veda. Listen, I am describing that supreme thing. 25.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas