श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.201.24 
मत्स्यो यथा स्रोत इवाभिपाती
तथा कृतं पूर्वमुपैति कर्म।
शुभे त्वसौ तुष्यति दुष्कृते तु
न तुष्यते वै परम: शरीरी॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जैसे मछली जल के प्रवाह के साथ बहती है, वैसे ही मनुष्य भी पूर्वकृत कर्म का अनुसरण करता है। उसे उस कर्म के प्रवाह में बहना ही पड़ता है; परंतु उस अवस्था में उत्तम शरीर में स्थित जीवात्मा शुभ फल पाकर संतुष्ट और अशुभ फल पाकर दुःखी होता है (यह उसकी मूर्खता ही है)।॥24॥
 
Just like a fish flows with the flow of water, similarly a human follows the karma done earlier. He has to flow in the flow of that karma; but in that condition the soul in the best body is satisfied on getting auspicious results and becomes sad on getting inauspicious results (this is his foolishness only).॥24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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