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mahabharat 12.201.22: मनुष्य जो कर्म वाणी से करता है, उन कर्मों का फल वाणी से ही भोगता है और जो कर्म मन से करता है, उन कर्मों का फल आत्मा मन से ही भोगता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 12.201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.201.22 
वाचा तु यत् कर्म करोति किंचिद्
वाचैव सर्वं समुपाश्नुते तत्।
मनस्तु यत् कर्म करोति किञ्चि-
न्मन:स्थ एवायमुपाश्नुते तत्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जो कर्म वाणी से करता है, उन कर्मों का फल वाणी से ही भोगता है और जो कर्म मन से करता है, उन कर्मों का फल आत्मा मन से ही भोगता है ॥22॥
 
Whatever deeds a man does with his words, he enjoys the fruits of those deeds with the words only. And whatever deeds he does with his mind, the soul enjoys the fruits of those deeds with the mind only. ॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)