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mahabharat 12.201.21: जीव अपने शरीर से जो भी अच्छे या बुरे कर्म करता है, उन कर्मों का फल वह शरीर में आसक्त रहते हुए भोगता है; क्योंकि शरीर ही वह स्थान है जहाँ मनुष्य सुख-दुःख का अनुभव करता है ॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.201.21 
यद् यच्छरीरेण करोति कर्म
शरीरयुक्त: समुपाश्नुते तत्।
शरीरमेवायतनं सुखस्य
दु:खस्य चाप्यायतनं शरीरम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जीव अपने शरीर से जो भी अच्छे या बुरे कर्म करता है, उन कर्मों का फल वह शरीर में आसक्त रहते हुए भोगता है; क्योंकि शरीर ही वह स्थान है जहाँ मनुष्य सुख-दुःख का अनुभव करता है ॥ 21॥
 
Whatever good or bad deeds a living being performs with its body, it experiences the consequences of those deeds while it is attached to the body; because the body is the place where one experiences happiness and sorrow. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)