श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.201.20 
शब्दाश्च रूपाणि रसाश्च पुण्या:
स्पर्शाश्च गन्धाश्च शुभास्तथैव।
नरो न संस्थानगत: प्रभु: स्या-
देतत् फलं सिद्धॺति कर्मलोके॥ २०॥
 
 
अनुवाद
शब्द, रूप, शुद्ध रस, सुखद स्पर्श और सुन्दर गंध - ये कर्मों के फल हैं; परंतु इस शरीर में स्थित मनुष्य इन फलों को प्राप्त करने में समर्थ नहीं है। कर्मों का फल उस शरीर में प्राप्त होता है जिसे मनुष्य भोगने के लिए प्राप्त करता है, जो भगवान के अधीन है। 20॥
 
Words, form, pure taste, pleasant touch and beautiful smell – these are the fruits of actions; But the human being situated in this body is not capable of attaining these fruits. The fruits of one's actions are received in the body one acquires to enjoy them, which is under the control of God. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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