श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.201.19 
गुणात्मकं कर्म वदन्ति वेदा-
स्तस्मान्मन्त्रो मन्त्रपूर्वं हि कर्म।
विधिर्विधेयं मनसोपपत्ति:
फलस्य भोक्ता तु तथा शरीरी॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वेद कहते हैं कि कर्म त्रिगुणात्मक है, अर्थात् वह सात्विक, राजस और तामस - ये तीन प्रकार के हैं; इसीलिए मन्त्र भी सात्विक आदि तीन प्रकार के हैं; क्योंकि मन्त्रों के उच्चारण से ही कर्मों का अनुष्ठान होता है। इसी प्रकार उन कर्मों की विधि, विधेय (उनके लिए किए जाने वाले कार्य), मन के द्वारा इच्छित फल की प्राप्ति और उसे भोगने वाला देहधारी चेतन प्राणी - ये सब तीन प्रकार के हैं।॥19॥
 
Vedas say that karma is triple in nature i.e. it is of three types namely Sattvik, Rajas and Tamas; That is why mantras are also of three types namely Satvik etc.; Because the rituals of karma are performed only by chanting mantras. Similarly, the method of those actions, the predicate (the work to be done for them), the achievement of the desired result through the mind and the bodily conscious creature who enjoys it – all these are of three types. 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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