श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.201.18 
कृत्स्नस्तु मन्त्रो विधिवत् प्रयुक्तो
यथा यथोक्तास्त्विह दक्षिणाश्च।
अन्नप्रदानं मनस: समाधि:
पञ्चात्मकं कर्मफलं वदन्ति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
विद्वान् लोग कहते हैं कि यज्ञ के इन पाँच अंगों - विधिपूर्वक मन्त्रों का जप, वैदिक विधि से यज्ञ करना, यथोचित दक्षिणा देना, अन्नदान और मन को एकाग्र करना - के करने पर ही यज्ञ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।॥18॥
 
Learned people say that only when these five parts of the yajna are performed - chanting of the mantras in the prescribed manner, performing the yajnas as per the Vedic rules, giving appropriate dakshina, donating food grains and concentrating the mind - one can achieve the full benefits of the yajna.॥ 18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas