Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.201.14: जब मन नित्य कर्मों द्वारा आसक्ति और मोह रूपी मलों को दूर करके दर्पण के समान स्वच्छ और चमकीला हो जाता है, तब वह प्रकाशवान (अच्छे विवेक के प्रकाश से परिपूर्ण) और नित्य सुख की इच्छा रखने वाला (मुमुक्षु) होकर निर्वाण भाव से धर्म में प्रवृत्त होता है और कर्म मार्ग द्वारा अतीत और कामनाओं से मुक्त होकर परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करता है॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.201.14 
आत्मादिभि: कर्मभिरिध्यमानो
धर्मे प्रवृत्तो द्युतिमान् सुखार्थी।
परं हि तत् कर्मपथादपेतं
निराशिषं ब्रह्मपरं ह्यवैति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब मन नित्य कर्मों द्वारा आसक्ति और मोह रूपी मलों को दूर करके दर्पण के समान स्वच्छ और चमकीला हो जाता है, तब वह प्रकाशवान (अच्छे विवेक के प्रकाश से परिपूर्ण) और नित्य सुख की इच्छा रखने वाला (मुमुक्षु) होकर निर्वाण भाव से धर्म में प्रवृत्त होता है और कर्म मार्ग द्वारा अतीत और कामनाओं से मुक्त होकर परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करता है॥14॥
 
When the mind becomes clean and shining like a mirror by removing the impurities of attachment and attachment through daily rituals, then it becomes luminous (filled with the light of good conscience) and desirous of daily happiness (Mumukshu) and engages in religion with a sense of nirvana and through the path of karma, it realizes the Supreme God, free from the past and desires. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)