श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.201.10-11 
मनुरुवाच
यद् यत्प्रियं यस्य सुखं तदाहु-
स्तदेव दु:खं प्रवदन्त्यनिष्टम्॥ १०॥
इष्टं च मे स्यादितरच्च न स्या-
देतत्कृते कर्मविधि: प्रवृत्त:।
इष्टं त्वनिष्टं च न मां भजेते-
त्येतत्कृते ज्ञानविधि: प्रवृत्त:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मनु बोले, "मनुष्य को जो कुछ प्रिय है, वही उसके लिए सुख कहा गया है और जो कुछ अप्रिय है, वही दुःख कहा गया है। जो मुझे चाहिए, उसकी प्राप्ति के लिए और अशुभ से छुटकारा पाने के लिए कर्म का अनुष्ठान आरम्भ किया गया है और कामनाओं और अशुभों, दोनों से बचने के लिए ज्ञानयोग का उपदेश दिया गया है॥10-11॥
 
Manu said, "Whatever is liked by a person, it is said to be happiness for him and whatever is disliked is said to be sorrow. To achieve what I want and to get rid of evil, the rituals of karma have been started and to avoid both the desires and evils, the teachings of Gyanyoga have been given.॥ 10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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