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श्लोक 12.20.14  |
हरिश्चन्द्र: पार्थिवेन्द्र: श्रुतस्ते
यज्ञैरिष्ट्वा पुण्यभाग् वीतशोक:।
ऋद्धॺा शक्रं योऽजयन्मानुष: सं-
स्तस्माद् यज्ञे सर्वमेवोपयोज्यम्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| आपने महान राजा हरिश्चंद्र के बारे में तो सुना ही होगा, जिन्होंने मनुष्य होते हुए भी अपने धन से इंद्र को भी परास्त कर दिया था। वे भी विभिन्न यज्ञ करके पुण्य के भागी बने और दुःखों से मुक्त हुए। इसलिए सारा धन यज्ञों में ही खर्च करना चाहिए। |
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| You must have heard of the great King Harishchandra, who, despite being a human being, defeated even Indra with his wealth. He too, by performing various sacrifices, became a sharer of merits and became free from sorrows. Therefore, all wealth should be spent in sacrifices only. |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि देवस्थानवाक्ये विंशोऽध्याय:॥ २०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें देवस्थानवाक्यविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०॥
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