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mahabharat 12.199.99: राजा ने कहा- "विकृत! जब विकृत तुम्हारा दिया हुआ ऋण लौटा रहा है, तो तुम उसे आज ही क्यों नहीं स्वीकार कर लेते? जैसे उसने तुम्हारी दी हुई वस्तु स्वीकार की, वैसे ही तुम भी उसकी दी हुई वस्तु स्वीकार कर लो। देर मत करो।"   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  12.199.99 
राजोवाच
दीयमानं न गृह्णासि ऋणं कस्मात् त्वमद्य वै।
यथैव तेऽभ्यनुज्ञातं तथा गृह्णीष्व मा चिरम्॥ ९९॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा- "विकृत! जब विकृत तुम्हारा दिया हुआ ऋण लौटा रहा है, तो तुम उसे आज ही क्यों नहीं स्वीकार कर लेते? जैसे उसने तुम्हारी दी हुई वस्तु स्वीकार की, वैसे ही तुम भी उसकी दी हुई वस्तु स्वीकार कर लो। देर मत करो।"
 
The king said- Vikrit! When Vikrit is returning the loan given to you, then why don't you accept it today? Just like he accepted the thing given by you, in the same way you should also accept the thing given by him. Do not delay.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)