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mahabharat 12.199.94-95: तत्पश्चात् मैंने भी अपनी शुद्धि के लिए पुण्यकर्म किये। हे राजन! मैंने दो कपिला गायें खरीदीं, जो बहुत दूध देती थीं और उनके बछड़े भी मैंने खरीदे और उन्हें विधिपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक एक उत्तम वृत्ति वाले ब्राह्मण को दे दिया। हे प्रभु! मैं उस दान का फल उसे लौटाना चाहता हूँ। 94-95।   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 94-95
 
 
श्लोक  12.199.94-95 
ततो मे सुकृतं कर्म कृतमात्मविशुद्धये।
गावौ च कपिले क्रीत्वा वत्सले बहुदोहने॥ ९४॥
ते चोञ्छवृत्तये राजन् मया समपवर्जिते।
यथाविधि यथाश्रद्धं तदस्याहं पुन: प्रभो॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् मैंने भी अपनी शुद्धि के लिए पुण्यकर्म किये। हे राजन! मैंने दो कपिला गायें खरीदीं, जो बहुत दूध देती थीं और उनके बछड़े भी मैंने खरीदे और उन्हें विधिपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक एक उत्तम वृत्ति वाले ब्राह्मण को दे दिया। हे प्रभु! मैं उस दान का फल उसे लौटाना चाहता हूँ। 94-95।
 
Thereafter I also performed pious deeds for my purification. O King! I bought two Kapila cows which gave a lot of milk along with their calves and gave them to a Brahmin with a noble attitude with due rituals and devotion. O Lord! I want to return the fruits of that donation to him. 94-95.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)