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mahabharat 12.199.75: ब्राह्मण बोला, "हे राजन! मैंने आपसे दान स्वीकार करने के लिए न तो आग्रह किया था और न ही मैं दान देने आपके घर गया था। आप स्वयं यहाँ आये और भिक्षा मांगी, फिर आप दान लेने से कैसे इनकार कर सकते हैं?"   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  12.199.75 
ब्राह्मण उवाच
न च्छन्दयामि ते राजन्नापि ते गृहमाव्रजम्।
इहागम्य तु याचित्वा न गृह्णीषे पुन: कथम्॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला, "हे राजन! मैंने आपसे दान स्वीकार करने के लिए न तो आग्रह किया था और न ही मैं दान देने आपके घर गया था। आप स्वयं यहाँ आये और भिक्षा मांगी, फिर आप दान लेने से कैसे इनकार कर सकते हैं?"
 
The Brahmin said, "O King! I did not request or urge you to accept the donation, nor did I go to your house to give it. You yourself came here and begged; then how can you refuse to accept it?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)