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mahabharat 12.199.64: सत्य ही एकमात्र अविनाशी ब्रह्म है। सत्य ही एकमात्र अक्षय तप है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी यज्ञ है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी सनातन वेद है। 64॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  12.199.64 
सत्यमेकाक्षरं ब्रह्म सत्यमेकाक्षरं तप:।
सत्यमेकाक्षरो यज्ञ: सत्यमेकाक्षरं श्रुतम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
सत्य ही एकमात्र अविनाशी ब्रह्म है। सत्य ही एकमात्र अक्षय तप है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी यज्ञ है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी सनातन वेद है। 64॥
 
Truth is the only imperishable Brahman. Truth is the only inexhaustible penance, Truth is the only imperishable Yagya, Truth is the only imperishable eternal Veda. 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)