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mahabharat 12.199.58: हे शत्रुदमनराज! आपको झूठ बोलना उचित नहीं है और मैं भी अपनी बात को झूठा नहीं कह सकता ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  12.199.58 
न युक्तं तु मृषा वाणी त्वया वक्तुमरिंदम।
तथा मयाप्यभिहितं मिथ्या कर्तुं न शक्यते॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुदमनराज! आपको झूठ बोलना उचित नहीं है और मैं भी अपनी बात को झूठा नहीं कह सकता ॥58॥
 
O King of Shatrudaman! It is not proper for you to lie and even I cannot make my statement false. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)