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mahabharat 12.199.54: ब्राह्मण बोला - हे राजन! अब मैंने अपने जप का फल दे दिया है; अतः अब मैं कुछ और ग्रहण नहीं करूँगा। इस विषय में आज मेरे और आपके वचन ही प्रमाण हैं (हम दोनों को अपने-अपने वचन पर दृढ़ रहना चाहिए)॥54॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.199.54 
ब्राह्मण उवाच
नाददेऽपरवक्तव्यं दत्तं चास्य फलं मया।
वाक्यं प्रमाणं राजर्षे ममाद्य तव चैव हि॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - हे राजन! अब मैंने अपने जप का फल दे दिया है; अतः अब मैं कुछ और ग्रहण नहीं करूँगा। इस विषय में आज मेरे और आपके वचन ही प्रमाण हैं (हम दोनों को अपने-अपने वचन पर दृढ़ रहना चाहिए)॥54॥
 
The Brahmin said, "O King! Now I have given the fruits of my Japa; hence I will not accept anything else. In this matter, today only my and your words are proof (both of us should remain firm on our respective words). ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)