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mahabharat 12.199.53: राजा ने कहा, "ब्राह्मण! यदि तुम मुझे अपने जप से उत्पन्न धर्म का फल नहीं बता रहे हो, तो उस धर्म का अज्ञात फल मेरे किस काम का? वह सब फल तुम्हारे पास ही रहेगा। मैं संदिग्ध फल नहीं चाहता हूँ ॥ 53॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  12.199.53 
राजोवाच
अज्ञातमस्य धर्मस्य फलं किं मे करिष्यति।
फलं ब्रवीषि धर्मस्य न चेज्जप्यकृतस्य माम्।
प्राप्नोतु तत् फलं विप्रो नाहमिच्छे ससंशयम्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा, "ब्राह्मण! यदि तुम मुझे अपने जप से उत्पन्न धर्म का फल नहीं बता रहे हो, तो उस धर्म का अज्ञात फल मेरे किस काम का? वह सब फल तुम्हारे पास ही रहेगा। मैं संदिग्ध फल नहीं चाहता हूँ ॥ 53॥
 
The king said, "Brahmin! If you are not telling me the fruit of the Dharma generated by your Japa, then what use will the unknown fruit of this Dharma be to me? All that fruit will remain with you. I do not want a doubtful fruit. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)