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mahabharat 12.199.41: हे नरदेव! आप उन ब्राह्मणों को भिक्षा दीजिए जो संसार मार्ग पर हैं। मैं आपसे भिक्षा नहीं लूँगा। हे राजनश्रेष्ठ! इस समय आपकी क्या इच्छा है? मैं आपको क्या दूँ? बताइए, मैं अपनी तपस्या से आपका कौन-सा कार्य सिद्ध कर सकता हूँ?॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.199.41 
तेभ्य: प्रयच्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप।
अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददामि ते।
ब्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधयामि किम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हे नरदेव! आप उन ब्राह्मणों को भिक्षा दीजिए जो संसार मार्ग पर हैं। मैं आपसे भिक्षा नहीं लूँगा। हे राजनश्रेष्ठ! इस समय आपकी क्या इच्छा है? मैं आपको क्या दूँ? बताइए, मैं अपनी तपस्या से आपका कौन-सा कार्य सिद्ध कर सकता हूँ?॥ 41॥
 
O lord of men! You should give alms to those Brahmins who are on the path of worldly life. I will not take alms from you. O best of kings! What do you desire at this time? What should I give you? Tell me, which of your tasks can I accomplish through my penance?॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)