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mahabharat 12.199.26: धर्म ने कहा, 'मुनि! मन को शरीर में आसक्त रखना उचित नहीं है। आप शरीर को त्यागकर सुखी हो जाएँ। उन शुद्ध लोकों में जाएँ जो रजोगुण से रहित हैं, जहाँ आपको फिर शोक नहीं करना पड़ेगा॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.199.26 
धर्म उवाच
अलं देहे मन: कृत्वा त्यक्त्वा देहं सुखी भव।
गच्छ लोकानरजसो यत्र गत्वा न शोचसि॥ २६॥
 
 
अनुवाद
धर्म ने कहा, 'मुनि! मन को शरीर में आसक्त रखना उचित नहीं है। आप शरीर को त्यागकर सुखी हो जाएँ। उन शुद्ध लोकों में जाएँ जो रजोगुण से रहित हैं, जहाँ आपको फिर शोक नहीं करना पड़ेगा॥ 26॥
 
Dharma said, 'Muni! It is not right to keep the mind attached to the body. You should leave the body and be happy. Go to those pure realms which are devoid of the Rajoguna, where you will not have to grieve again.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)